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  • किस्मत ने बदली करवट! एक ही दिन में निकले 3 इनाम, लॉटरी टिकट ने कर दिया मालामाल:

    किस्मत ने बदली करवट! एक ही दिन में निकले 3 इनाम, लॉटरी टिकट ने कर दिया मालामाल:

    किस्मत ने बदली करवट! एक ही दिन में निकले 3 इनाम, लॉटरी टिकट ने कर दिया मालामाल:

    किस्मत कब पलट जाए, इसका कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जहां लंबे समय से लॉटरी टिकट खरीद रहे एक व्यक्ति की किस्मत अचानक चमक गई। एक दिन में ही उसके टिकट पर इनाम निकला और अगले दिन दोबारा टिकट खरीदने पर फिर दो इनाम मिल गए।

    यह मामला जयपुर के रहने वाले अशोक कुमार से जुड़ा है, जो फर्नीचर का काम करते हैं। उन्होंने करीब एक महीने पहले ऑनलाइन विज्ञापन देखने के बाद लॉटरी टिकट खरीदना शुरू किया था। शुरुआत में उन्हें कोई बड़ा इनाम नहीं मिला, लेकिन हाल ही में लगातार निकले इनाम ने उन्हें हैरान कर दिया।

    पहले निकला 50 हजार रुपये का इनाम

    बताया गया कि कुछ दिनों पहले अशोक कुमार की टिकट पर रात के समय 50 हजार रुपये का इनाम निकला। इसके बाद उन्होंने इनाम में मिली राशि से अगले दिन की लॉटरी टिकटें खरीद लीं।

    अगले दिन उनकी किस्मत ने एक बार फिर साथ दिया। अलग-अलग समय की खरीदी गई टिकटों में से दो टिकटों पर इनाम निकला। इनमें एक पर 50 हजार रुपये और दूसरी पर 12 हजार रुपये का पुरस्कार मिला।

    इस तरह बेहद कम समय के भीतर उनकी टिकटों से कुल तीन इनाम निकल आए।

    एक महीने पहले शुरू किया था टिकट खरीदना

    लॉटरी एजेंसी संचालक के मुताबिक, अशोक कुमार ने करीब एक महीने पहले टिकट खरीदना शुरू किया था। उन्होंने ऑनलाइन एजेंसी का विज्ञापन देखने के बाद टिकट लेने की शुरुआत की थी।

    शुरुआती दिनों में उन्हें कोई खास इनाम नहीं मिला, लेकिन हालिया दिनों में लगातार पुरस्कार मिलने से उनकी किस्मत बदलती नजर आई।

    अन्य टिकटों पर भी निकले इनाम

    एजेंसी संचालक ने बताया कि पिछले कुछ दिनों में उनकी एजेंसी से बेची गई अन्य टिकटों पर भी कई पुरस्कार निकले हैं। इनमें 50-50 हजार रुपये के कुछ इनाम के अलावा चार-पांच छोटे पुरस्कार भी शामिल बताए गए हैं।

    लगातार पुरस्कार निकलने की खबर के बाद लॉटरी टिकट खरीदने वालों के बीच भी इस घटना की चर्चा हो रही है। हालांकि लॉटरी पूरी तरह संयोग और निर्धारित नियमों पर आधारित होती है, इसलिए किसी टिकट से इनाम निकलने की कोई गारंटी नहीं होती।

  • Gen Z की ट्रैवल ‘डिक्शनरी’ में जुड़े 8 नए शब्द, बदल रहा है सफर का अंदाज.

    Gen Z की ट्रैवल ‘डिक्शनरी’ में जुड़े 8 नए शब्द, बदल रहा है सफर का अंदाज.

    Gen Z की ट्रैवल ‘डिक्शनरी’ में जुड़े 8 नए शब्द, बदल रहा है सफर का अंदाज.

    जेनरेशन Z अपने खान-पान, समझने, काम करने, नए शब्दों के प्रयोग से लेकर यात्रा करने के तरीके तक को लेकर अक्सर चर्चा में रहते हैं। कई ऐसे शब्द हैं जिनका प्रचलन Gen Z के कारण हुआ है। यात्रा के मामले में भी Gen Z की सोच काफी अलग है। नई पीढ़ी ने अचानक यात्रा की सोच बदल दी है। मूड, पसंद, व्यक्तित्व और साथ जाने वाले लोगों के हिसाब से यात्रा का तरीका भी बदल रहा है। कई ऐसे शब्द हैं जो सफर के लिए काफी प्रचलित हैं। आइए जानते हैं Gen Z ने सफर को किस तरह बदल दिया है और उनकी इसको लेकर क्या सोच है।

    दरअसल, Airbnb और YouGov की साझेदारी में एक रिपोर्ट सामने आई है, जिसका नाम ‘नेवर द सेम: द न्यू रूल्स ऑफ द Gen Z ट्रैवल इन इंडिया है। इस रिपोर्ट के अनुसार आज के युवा भारतीय यात्रियों के बीच कुछ नए ट्रैवल ट्रेंड तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। इनमें अचानक छुट्टी पर निकलना, तनाव से राहत के लिए यात्रा करना और अपनी पसंद व व्यक्तित्व के मुताबिक जगह चुनना शामिल है।

    माइक्रो-कैशन

    Gen Z की सफर डिक्शनरी में माइक्रो-कैशन काफी प्रचलित है, यह 24 से 72 घंटे की छोटी यात्रा के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसमें कोई सालाना बड़ी छुट्टी नहीं होती, बल्कि रोजमर्रा की व्यस्त जिंदगी से थोड़े समय के लिए ब्रेक लेने का आसान तरीका है। रिपोर्ट के अनुसार, Gen Z के 66 प्रतिशत लोग यात्रा के कुछ दिन या कुछ सप्ताह पहले ही बुकिंग करते हैं। वहीं, 87 प्रतिशत लोग एक सप्ताह से कम समय की यात्रा पसंद करते हैं।

    रूम रॉटिंग

    रूम रॉटिंग का मतलब है ऐसी यात्रा, जिसमें घूमने-फिरने या जगह को देखने की बजाय आराम करना और ठहरने की जगह पर समय बिताना ही मुख्य उद्देश्य होता है। इसमें यात्री होटल, होमस्टे या किसी अन्य ठहरने की जगह पर आराम से समय बिताते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, जेन Z के 3 में से 2 यात्री सफर के दौरान कुछ खास न करने के इरादे से घूमने जाते हैं। वहीं, 10 में से 8 लोग अपनी यात्रा का कम से कम आधा समय उस जगह पर बिताते हैं, जहां वे ठहरे होते हैं।

    डी-इन्फ्लुएंस्ड ट्रैवल

    सोशल मीडिया पर डी-इन्फ्लुएंस्ड ट्रैवल का काफी ट्रेंड देखने को मिलता है। इसमें लोकप्रिय जगहों के पीछे भागने के बजाए ऐसी जगहों की तलाश करना है, जो कम चर्चित और अलग हों। यहां भीड़भाड़ से अलग कुछ नया और सुकून भरा अनुभव हासिल करना मुख्य उद्देश्य होता है। रिपोर्ट में बताया गया कि, जेन Z के करीब 95 प्रतिशत यात्री चाहते हैं कि उनकी यात्रा व्यक्तिगत और अलग अनुभव वाली हो और पूरी तरह पहले से तय न हो। वहीं, 90% युवा वायरल जगहों की बजाय कम प्रसिद्ध और अनदेखी जगहों पर जाना पसंद करते हैं।

    मिरर ट्रिप

    मिरर ट्रिप में अपनी पसंद और व्यक्तित्व के हिसाब से यात्रा की जाती है। ऐसी जगह, ठहरने की जगह और अनुभव चुनना, जो आपके व्यक्तित्व और रुचियों को दर्शाते हों। यानी आपको जो चीजें पसंद हैं उसके अनुसार जगह का चुनाव करना। रिपोर्ट के अनुसार, 92% यात्रियों का मानना है कि उनके लिए यह जरूरी है कि यात्रा की जगह उनकी व्यक्तिगत पसंद के मुताबिक हो। वहीं, 87% लोगों का मानना है कि यात्रा उनके व्यक्तित्व और पहचान को दर्शाती हो।

    व्हाई-कैशन

    इसमें यात्री किसी प्रसिद्ध जगह जाने के बजाए किसी खास एहसास को महसूस करने के लिए यात्रा करते हैं। कोई प्रकृति के बीच शांति चाहता है, तो कोई नए खानपान और संस्कृति को जानना चाहता है। किसी को रोजमर्रा की जिंदगी से कुछ दूर रहना पसंद होता है। रिपोर्ट के अनुसार, 67% जेन Z यात्रियों का कहना है कि उनकी कोई भी दो यात्राएं एक जैसी नहीं हैं। यात्रा के दौरान उनके पसंदीदा अनुभवों में खानपान, प्रकृति, संस्कृति और रोमांच से जुड़ी गतिविधियां शामिल हैं।

    लोकल लॉर हंटिंग

    लोकल लॉर हंटिंग का मतलब सफर के दौरान किसी शहर या कस्बे के उन हिस्सों को देखना, जहां आम पर्यटक अक्सर नहीं जाते हैं। इसमें स्थानीय बाजार, किराने की दुकानें, मोहल्ले और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी जगहें शामिल हो सकती है। रिपोर्ट में बताया गया कि 81% जेन Z यात्री घूमने के दौरान स्थानीय बाजारों, किराने की दुकानों और आम मोहल्लों जैसे स्थानों को देखना पसंद करते हैं।

    मेंटी बी ट्रैवल

    इसमें जेन Z अपना तनाव दूर करने के लिए यात्रा करते हैं। ऐसी यात्रा का प्लान अक्सर अचानक बनता है। रिपोर्ट के अनुसार, तनाव और काम से होने वाली थकान से राहत पाना जेन Z के बीच यात्रा की योजना बनाने की सबसे बड़ी वजह है।

    साइड-क्वेस्टिंग

    जेन Z साल में एक बार लंबी छुट्टी पर जाने के बजाए छोटी-छोटी यात्राएं करना पसंद करते हैं। साइड-क्वेस्टिंग का अर्थ छोटी यात्रा करना है। रिपोर्ट के अनुसार, 10 में से करीब 7 जेन Z यात्री एक लंबी सालाना छुट्टी की बजाए तीन छोटी यात्राएं करना पसंद करते हैं।

  • गुमशुदा पत्नी को सामने ‘देख’ फूट-फूटकर रोया पति, तीन महीने बाद हुआ भावुक मिलन.

    गुमशुदा पत्नी को सामने ‘देख’ फूट-फूटकर रोया पति, तीन महीने बाद हुआ भावुक मिलन.

    गुमशुदा पत्नी को सामने ‘देख’ फूट-फूटकर रोया पति, तीन महीने बाद हुआ भावुक मिलन.

    किसी अपने के अचानक लापता हो जाने के बाद परिवार किस तरह के इंतजार और चिंता से गुजरता है, इसका अंदाजा लगाना आसान नहीं है। ऐसे में वही व्यक्ति लंबे समय बाद अचानक सामने आ जाए तो उस पल की भावनाएं संभालना भी मुश्किल हो सकता है।

    सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में ऐसा ही भावुक पल दिखाई दे रहा है। बताया जा रहा है कि एक महिला करीब तीन महीने से लापता थी। जब वह लंबे समय बाद अपने पति के सामने पहुंची तो पति खुद को संभाल नहीं पाया और उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े।

    पत्नी को देखते ही भावुक हुआ पति

    वायरल वीडियो में आसपास कई लोग नजर आ रहे हैं। इसी दौरान महिला को देखकर उसका पति उसकी तरफ बढ़ता है। लंबे समय से इंतजार कर रहे शख्स की भावनाएं पत्नी को सामने देखते ही छलक पड़ती हैं।

    वह रोते हुए पत्नी के पास बैठ जाता है। आसपास मौजूद लोग भी इस पूरे पल के दौरान भावुक नजर आते हैं। पति के चेहरे पर राहत और खुशी साफ दिखाई देती है।

    यह मुलाकात उस परिवार के लिए कितनी अहम रही होगी, इसका अंदाजा पति की प्रतिक्रिया से लगाया जा सकता है।

    तीन महीने से लापता थी महिला

    सोशल मीडिया पर वीडियो के साथ साझा की गई जानकारी के मुताबिक, महिला लगभग तीन महीने से लापता थी। पोस्ट में यह भी दावा किया गया है कि महिला मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों से गुजर रही थी।

    हालांकि, वायरल वीडियो में महिला के लापता होने की पूरी वजह या इन तीन महीनों के दौरान वह कहां थी, इसकी विस्तृत जानकारी सामने नहीं आती है। इसलिए सोशल मीडिया पोस्ट में किए गए दावों को पूरी तरह सत्यापित जानकारी के तौर पर नहीं देखा जा सकता।

    किसी परिवार के सदस्य के लंबे समय तक लापता रहने की स्थिति परिवार के लिए बेहद तनावपूर्ण हो सकती है। ऐसे में महीनों बाद सुरक्षित मिलना परिवार के लिए बड़ी राहत का पल हो सकता है।

    पति की आंखों से छलक पड़े आंसू

    वीडियो का सबसे भावुक हिस्सा उस समय दिखाई देता है जब पति अपनी पत्नी को सामने देखकर रोने लगता है। वह उसके पास बैठ जाता है और कुछ देर तक खुद को संभाल नहीं पाता।

    आसपास खड़े लोग भी इस भावुक मुलाकात को देखते हुए नजर आते हैं। वीडियो में किसी फिल्मी दृश्य की तरह कोई खास संवाद नहीं है, लेकिन पति की प्रतिक्रिया ही पूरे पल को भावुक बना देती है।

    सोशल मीडिया यूजर्स भी हुए भावुक

    वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने भी अपनी प्रतिक्रियाएं दीं। कई लोगों ने कहा कि पति की खुशी और राहत देखकर उनकी आंखें भी नम हो गईं।

    कुछ यूजर्स ने पति-पत्नी के रिश्ते को लेकर भावुक टिप्पणियां कीं, जबकि कई लोगों ने कमेंट सेक्शन में सिर्फ इमोशनल इमोजी के जरिए अपनी प्रतिक्रिया दी।

    एक यूजर ने लिखा कि वीडियो देखने के बाद वह बेहद भावुक हो गईं। वहीं कुछ लोगों ने इस मिलन को पति-पत्नी के रिश्ते में प्यार और लगाव का भावुक पल बताया।

    वायरल वीडियो ने छू लिया लोगों का दिल

    सोशल मीडिया पर रोजाना हजारों वीडियो वायरल होते हैं, लेकिन रिश्तों से जुड़े भावुक पल अक्सर लोगों का ध्यान खींच लेते हैं। इस वीडियो में भी लंबे इंतजार के बाद पति और पत्नी की मुलाकात ने लोगों को भावुक कर दिया है।

    फिलहाल वायरल पोस्ट में महिला के लापता होने और वापस मिलने से जुड़ी पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में वीडियो को लेकर सामने आ रहे अतिरिक्त दावों की पुष्टि किए बिना उन पर भरोसा करना उचित नहीं होगा। लेकिन पति की भावुक प्रतिक्रिया ने इस वीडियो को सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय जरूर बना दिया है।

  • माता-पिता भगवान नहीं हैं, CEO की वायरल पोस्ट पर क्यों मचा हंगामा?

    माता-पिता भगवान नहीं हैं, CEO की वायरल पोस्ट पर क्यों मचा हंगामा?

    माता-पिता भगवान नहीं हैं, CEO की वायरल पोस्ट पर क्यों मचा हंगामा?

    भारत में माता-पिता को बेहद सम्मान देने की परंपरा रही है। बचपन से ही बच्चों को सिखाया जाता है कि मां-बाप का सम्मान करना चाहिए और उनके योगदान को कभी नहीं भूलना चाहिए। लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक पोस्ट ने इसी सोच के एक हिस्से को अलग नजरिए से देखने की कोशिश की है।

    पोस्ट में सवाल उठाया गया है कि माता-पिता का सम्मान करना और उनकी हर बात को बिना सवाल किए सही मान लेना क्या एक ही बात है? इस विचार ने सोशल मीडिया पर लोगों के बीच बहस छेड़ दी है।

    वायरल पोस्ट में तर्क दिया गया है कि माता-पिता भी इंसान होते हैं और उनसे भी गलतियां हो सकती हैं। इसलिए केवल माता-पिता होने के आधार पर उनकी हर राय या हर फैसला सही मानना जरूरी नहीं होना चाहिए।

    ‘माता-पिता भगवान के समान हैं’ वाली सोच पर सवाल

    वायरल पोस्ट का सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाला हिस्सा यही है। इसमें कहा गया है कि माता-पिता को सम्मान देना जरूरी हो सकता है, लेकिन उन्हें भगवान का दर्जा देना अलग बात है।

    पोस्ट के मुताबिक, माता-पिता अपने बच्चों के लिए बहुत कुछ करते हैं, उनका पालन-पोषण करते हैं और उन्हें जीवन में आगे बढ़ाने की कोशिश करते हैं। लेकिन इसके बावजूद वे भी इंसान हैं और उनसे गलत निर्णय या गलतियां हो सकती हैं।

    यही वजह है कि पोस्ट में सम्मान और अंधी आज्ञाकारिता के बीच अंतर करने की बात कही गई है।

    क्या माता-पिता बनने से हर फैसला सही हो जाता है?

    पोस्ट में एक उदाहरण के जरिए सवाल किया गया है कि किसी व्यक्ति के माता-पिता बन जाने से क्या उसकी पुरानी कमियां या गलतियां अपने आप खत्म हो जाती हैं?

    इस विचार के मुताबिक, पिता या मां बनना निश्चित रूप से एक बड़ी जिम्मेदारी है, लेकिन केवल यह भूमिका किसी व्यक्ति को हर परिस्थिति में सही साबित नहीं करती।

    वायरल पोस्ट इसी सवाल के जरिए लोगों को सोचने के लिए कहती है कि बच्चों को अपने माता-पिता का सम्मान करते हुए भी अपनी जिंदगी और भविष्य से जुड़े फैसलों पर सवाल पूछने या अपनी राय रखने का अधिकार होना चाहिए।

    ‘तुम्हारे लिए इतना किया’ वाली बात पर भी बहस

    पोस्ट में उस तर्क पर भी सवाल उठाया गया है, जो कई परिवारों में बच्चों से बातचीत के दौरान सुनने को मिलता है कि ‘हमने तुम्हारे लिए इतना कुछ किया है।’

    वायरल विचार में कहा गया है कि बच्चे ने खुद दुनिया में आने का फैसला नहीं किया था। उसे जन्म देने का निर्णय माता-पिता का था। इसलिए केवल जन्म देने के आधार पर बच्चे से जीवनभर बिना सवाल किए हर बात मानने की अपेक्षा करना उचित है या नहीं, इस पर विचार किया जाना चाहिए।

    हालांकि, इस तर्क का मतलब माता-पिता के त्याग, मेहनत और प्यार को नकारना नहीं है। बहस का मूल मुद्दा यह है कि पारिवारिक रिश्तों में सम्मान और प्यार के साथ-साथ बच्चों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राय की भी जगह होनी चाहिए।

    सोशल मीडिया पर लोगों की अलग-अलग राय

    पोस्ट वायरल होने के बाद लोगों की प्रतिक्रियाएं भी अलग-अलग नजर आईं।

    कुछ यूजर्स ने कहा कि माता-पिता का सम्मान करना और अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने की आजादी, दोनों बातें एक साथ संभव हैं। उनके मुताबिक, किसी रिश्ते में सम्मान का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि व्यक्ति अपनी सोच पूरी तरह छोड़ दे।

    वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों ने इस विचार से असहमति जताई। उनका कहना है कि भारतीय परिवारों में माता-पिता बच्चों के लिए वर्षों तक मेहनत और त्याग करते हैं, इसलिए उनके योगदान को केवल इस आधार पर कम करके नहीं देखा जा सकता कि वे भी इंसान हैं।

    सम्मान और सहमति में क्या अंतर है?

    इस वायरल पोस्ट ने असल में एक व्यापक सामाजिक सवाल को चर्चा में ला दिया है। क्या किसी का सम्मान करने का मतलब उसकी हर बात से सहमत होना भी है?

    एक नजरिए से सम्मान का अर्थ किसी व्यक्ति की भूमिका, उम्र और योगदान को महत्व देना हो सकता है। दूसरी ओर, व्यक्तिगत निर्णयों में अपनी राय रखना और असहमति व्यक्त करना भी रिश्तों का हिस्सा हो सकता है।

    हर परिवार की परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए माता-पिता और बच्चों के रिश्ते को केवल ‘आज्ञा मानने’ या ‘आज्ञा न मानने’ के नजरिए से देखना भी अधूरा हो सकता है।

    फिलहाल CEO की बताई जा रही यह सोशल मीडिया पोस्ट इसी सवाल को लेकर चर्चा में है कि माता-पिता का सम्मान जरूरी है, लेकिन क्या सम्मान का मतलब हर बात को बिना सवाल किए स्वीकार करना भी होना चाहिए? इस सवाल पर सोशल मीडिया यूजर्स अपनी-अपनी सोच के मुताबिक राय दे रहे हैं।

  • मुंबई मेट्रो में ‘पीकदान’ देखकर चौंके लोग, सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

    मुंबई मेट्रो में ‘पीकदान’ देखकर चौंके लोग, सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

    मुंबई मेट्रो में ‘पीकदान’ देखकर चौंके लोग, सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

    मुंबई मेट्रो की एक तस्वीर इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है। आमतौर पर मेट्रो स्टेशनों पर साफ-सफाई और यात्रियों की सुविधा से जुड़ी चीजें दिखाई देती हैं, लेकिन वायरल तस्वीर में एक ऐसी व्यवस्था नजर आई, जिसने लोगों का ध्यान खींच लिया।

    तस्वीर में थूकने के लिए एक खास ‘स्पिट बिन’ यानी थूकदान लगा दिखाई दे रहा है। इसे देखकर सोशल मीडिया यूजर्स के बीच बहस शुरू हो गई कि आखिर मेट्रो स्टेशन जैसी सार्वजनिक जगह पर इस तरह की सुविधा की जरूरत क्यों पड़ी।

    तस्वीर में क्या नजर आ रहा है?

    सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही तस्वीर मुंबई मेट्रो के एक स्टेशन की बताई जा रही है। इसमें एक टचलेस स्पिट बिन दिखाई देता है। यानी इसे इस्तेमाल करने के लिए हाथ से किसी हिस्से को छूने की जरूरत नहीं पड़ती।

    इसके साथ लगे बोर्ड पर मुंबई मेट्रो से संबंधित लोगो और ‘Be Responsible’ संदेश दिखाई देता है। तस्वीर में इस व्यवस्था को ‘World’s First Defined Place to Spit’ के तौर पर भी पेश किया गया है।

    रिपोर्टों में इस तस्वीर को गुंडावली मेट्रो स्टेशन से जोड़कर बताया गया है। हालांकि, वायरल पोस्ट के आधार पर तस्वीर की पूरी परिस्थितियों और मौजूदा स्थिति की स्वतंत्र पुष्टि अलग से नहीं की गई है।

    किस कंपनी ने बनाया है यह स्पिट बिन?

    वायरल खबरों के मुताबिक, इस तरह के स्पिट बिन को EzySpit नाम की कंपनी ने तैयार किया है। कंपनी के अनुसार, इसका उद्देश्य सार्वजनिक स्थानों पर खुले में थूकने से होने वाली गंदगी को कम करना और थूक के सीधे संपर्क में आने की संभावना घटाना है।

    इस व्यवस्था में थूक को एक निर्धारित और बंद सिस्टम में रखने का विचार है, ताकि लोग सार्वजनिक स्थान के फर्श, दीवार या दूसरी जगहों पर न थूकें।

    जब थूकना मना है तो फिर ऐसी सुविधा क्यों?

    यही सवाल इस तस्वीर के वायरल होने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा में है।

    लोगों का एक वर्ग सवाल उठा रहा है कि अगर मेट्रो परिसर में थूकना नियमों के खिलाफ है, तो फिर थूकने के लिए अलग डिब्बा लगाने की जरूरत क्यों पड़ी?

    वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों का तर्क है कि अगर कोई व्यक्ति अपनी आदत के कारण थूकता ही है, तो कम से कम उसे एक निर्धारित स्थान उपलब्ध कराने से स्टेशन के दूसरे हिस्सों में गंदगी फैलने से रोका जा सकता है।

    यानी इस व्यवस्था को लेकर बहस केवल ‘पीकदान’ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठ रहा है कि सार्वजनिक स्वच्छता के लिए व्यवहार बदलना ज्यादा जरूरी है या व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराना।

    सोशल मीडिया पर दो तरह की राय

    तस्वीर वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं बंटी हुई नजर आईं।

    कुछ यूजर्स ने इसे व्यावहारिक कदम बताया। उनका कहना है कि अगर किसी सार्वजनिक स्थान

  • Reel बनाने का ऐसा क्रेज! ट्रेन के आगे पल्लू बांधकर महिला ने किया डांस, वीडियो वायरल.

    Reel बनाने का ऐसा क्रेज! ट्रेन के आगे पल्लू बांधकर महिला ने किया डांस, वीडियो वायरल.

    Reel बनाने का ऐसा क्रेज! ट्रेन के आगे पल्लू बांधकर महिला ने किया डांस, वीडियो वायरल.

    सोशल मीडिया पर वायरल होने के लिए लोग कई बार ऐसे वीडियो बना लेते हैं, जिन्हें देखकर यूजर्स हैरान रह जाते हैं। ऐसा ही एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा में है। इसमें साड़ी पहने एक महिला रेलवे ट्रैक पर खड़ी ट्रेन के सामने डांस करती दिखाई दे रही है। खास बात यह है कि महिला ने अपनी साड़ी का पल्लू ट्रेन के इंजन से बांधा हुआ नजर आ रहा है।

    वीडियो सामने आने के बाद लोग इसे लेकर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। कुछ यूजर्स ने इसे रील बनाने की दीवानगी बताया, तो कुछ लोगों ने रेलवे ट्रैक जैसी जगह पर इस तरह का वीडियो शूट करने को लेकर सुरक्षा संबंधी सवाल उठाए हैं।

    ट्रेन के सामने खड़े होकर डांस करती दिखी महिला

    वायरल वीडियो में महिला साड़ी और सनग्लासेस पहने रेलवे ट्रैक पर दिखाई देती है। उसके पीछे एक ट्रेन खड़ी नजर आती है। वीडियो में महिला अपनी साड़ी के पल्लू का एक सिरा ट्रेन के इंजन की तरफ बांधती है और इसके बाद कैमरे के सामने डांस करने लगती है।

    डांस के दौरान महिला ट्रेन की ओर इशारे करती हुई और अलग-अलग एक्सप्रेशन देती नजर आती है। पूरा वीडियो किसी फिल्मी गाने के सीन जैसा दिखाई देता है, जिसे सोशल मीडिया Reel के लिए दोहराने की कोशिश की गई हो।

    हालांकि, वायरल वीडियो को देखकर यह स्पष्ट नहीं है कि इसे किस रेलवे स्टेशन या स्थान पर रिकॉर्ड किया गया था। वीडियो के साथ किए जा रहे दावों की स्वतंत्र पुष्टि भी सामने नहीं आई है।

    सोशल मीडिया पर छिड़ी चर्चा

    यह वीडियो X पर ‘The Nalanda Index’ नाम के अकाउंट से शेयर किए जाने के बाद चर्चा में आया। पोस्ट में रील के लिए Views और Likes हासिल करने की कोशिश को लेकर सवाल उठाया गया।

    इसके बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने भी वीडियो पर अपनी प्रतिक्रियाएं देना शुरू कर दिया। कुछ लोगों ने इसे मजाकिया अंदाज में लिया और महिला के डांस पर टिप्पणी की, जबकि कुछ यूजर्स ने रेलवे ट्रैक पर इस तरह की शूटिंग को लेकर चिंता जताई।

    एक यूजर ने मजाक करते हुए लिखा कि क्या यहां Bollywood की शूटिंग चल रही है। वहीं कुछ लोगों ने पल्लू को ट्रेन से बांधने वाले सीन को लेकर भी अलग-अलग टिप्पणियां कीं।

    सुरक्षा को लेकर उठे सवाल

    वीडियो वायरल होने के बाद कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने रेलवे से जुड़े आधिकारिक अकाउंट्स को टैग करते हुए मामले की जांच की मांग की। लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि आखिर वीडियो कहां रिकॉर्ड किया गया और क्या शूटिंग के दौरान रेलवे की अनुमति ली गई थी।

    रेलवे ट्रैक और चलती या संचालन में रहने वाली ट्रेन के आसपास किसी भी तरह की लापरवाही गंभीर जोखिम पैदा कर सकती है। ऐसे में सिर्फ सोशल मीडिया पर Views या Likes हासिल करने के लिए रेलवे परिसर में इस तरह की गतिविधियां करना सुरक्षा के लिहाज से चिंता का विषय बन सकता है।

    फिलहाल वायरल वीडियो में दिखाई दे रही महिला की पहचान, वीडियो की सटीक लोकेशन और इसे रिकॉर्ड किए जाने की परिस्थितियों को लेकर पुख्ता जानकारी सामने नहीं आई है। इसलिए वीडियो से जुड़े दावों को पुष्टि किए गए तथ्य के बजाय वायरल सोशल मीडिया कंटेंट के तौर पर देखना उचित है।

  • कौन से मुस्लिम अपने नाम के साथ लिखते हैं ‘मुल्ला’, क्या होता है इसका मतलब?

    कौन से मुस्लिम अपने नाम के साथ लिखते हैं ‘मुल्ला’, क्या होता है इसका मतलब?

    कौन से मुस्लिम अपने नाम के साथ लिखते हैं ‘मुल्ला’, क्या होता है इसका मतलब?

    ‘मुल्ला’ शब्द इन दिनों एक बार फिर चर्चा में है। किसी व्यक्ति के नाम के साथ ‘मुल्ला’ लिखा देखकर अक्सर लोगों के मन में सवाल आता है कि आखिर इस शब्द का मतलब क्या है और मुस्लिम समाज में इसे कौन लोग अपने नाम के साथ इस्तेमाल करते हैं।

    दरअसल, ‘मुल्ला’ शब्द का इस्तेमाल अलग-अलग समय और क्षेत्रों में अलग अर्थों और संदर्भों में हुआ है। कई जगह यह धार्मिक ज्ञान रखने वाले व्यक्ति के लिए सम्मानसूचक संबोधन रहा है, जबकि कुछ परिवारों में यह लंबे समय से उपनाम या पारिवारिक नाम के रूप में भी इस्तेमाल होता है।

    ‘मुल्ला’ शब्द का क्या अर्थ है?

    ‘मुल्ला’ शब्द का संबंध इस्लामी धार्मिक और विद्वत परंपरा से माना जाता है। दक्षिण एशिया, ईरान और मध्य एशिया समेत कई क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता रहा है, जिसे धार्मिक शिक्षा या इस्लामी कानून का ज्ञान हो।

    हालांकि, इसकी व्युत्पत्ति को लेकर अलग-अलग भाषाई व्याख्याएं मिलती हैं। इसे सीधे तौर पर केवल ‘मौला’ शब्द से निकला हुआ बताना पूरी तरह निश्चित नहीं माना जाता। ऐतिहासिक रूप से ‘मुल्ला’ शब्द फारसी और अन्य भाषाई परंपराओं के जरिए अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित हुआ।

    समय और स्थान के अनुसार इसका अर्थ भी बदलता रहा है। कहीं यह धार्मिक शिक्षक के लिए सम्मानसूचक शब्द रहा, तो कहीं इसका इस्तेमाल इस्लामी विद्वान या धार्मिक पद से जुड़े व्यक्ति के लिए किया गया।

    पहले किन लोगों के लिए इस्तेमाल होता था ‘मुल्ला’?

    ऐतिहासिक रूप से ‘मुल्ला’ शब्द का इस्तेमाल ऐसे लोगों के लिए किया जाता रहा है जिन्हें कुरान, हदीस, इस्लामी कानून और धार्मिक शिक्षा का ज्ञान होता था।

    कई मुस्लिम समाजों में धार्मिक शिक्षक, मदरसे के विद्वान या स्थानीय स्तर पर धार्मिक मार्गदर्शन देने वाले व्यक्ति को सम्मान के तौर पर ‘मुल्ला’ कहा जाता था।

    हालांकि, यह समझना जरूरी है कि ‘मुल्ला’ कोई ऐसा एक समान आधिकारिक पद नहीं है, जिसकी योग्यता या नियुक्ति की पूरी दुनिया में एक जैसी व्यवस्था हो। अलग-अलग देशों और समुदायों में इस शब्द का इस्तेमाल अलग तरीके से हुआ है।

    धार्मिक संबोधन से सरनेम तक कैसे पहुंचा?

    समय के साथ कई ऐसे शब्द, जो कभी पेशे या सामाजिक भूमिका को बताते थे, बाद में परिवारों की पहचान का हिस्सा बन गए। ‘मुल्ला’ के साथ भी कुछ क्षेत्रों में ऐसा हुआ।

    जिन परिवारों के पूर्वज धार्मिक शिक्षा या धार्मिक सेवाओं से जुड़े रहे होंगे, उनमें यह शब्द पीढ़ियों के साथ पारिवारिक नाम के तौर पर इस्तेमाल होने लगा। इसके बाद जरूरी नहीं रहा कि उस परिवार का हर व्यक्ति धार्मिक विद्वान ही हो।

    आज किसी व्यक्ति के नाम में ‘मुल्ला’ लिखा होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह व्यक्ति मौलवी, इमाम या धार्मिक शिक्षक है। कई मामलों में यह केवल पारिवारिक उपनाम हो सकता है।

    क्या ‘मुल्ला’ कोई सरकारी उपाधि है?

    नहीं। ‘मुल्ला’ भारत में कोई सरकारी या कानूनी पदवी नहीं है।

    इसे पाने के लिए सरकार की ओर से कोई निर्धारित प्रमाणपत्र या आधिकारिक नियुक्ति प्रक्रिया नहीं होती। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक या पारिवारिक संदर्भों में हुआ है।

    यही वजह है कि किसी व्यक्ति के नाम के साथ ‘मुल्ला’ लिखा होने से उसकी सरकारी स्थिति, पेशा या धार्मिक पद अपने आप तय नहीं होता।

    भारत में कहां देखने को मिलता है यह सरनेम?

    भारत के अलग-अलग हिस्सों में मुस्लिम परिवारों के उपनाम अलग ऐतिहासिक और क्षेत्रीय परंपराओं से बने हैं। ‘मुल्ला’ भी कुछ क्षेत्रों और समुदायों में पारिवारिक नाम के तौर पर देखने को मिलता है।

    विशेष रूप से महाराष्ट्र, गुजरात और कोंकण क्षेत्र में इस उपनाम का इस्तेमाल करने वाले परिवार मिलते हैं। कुछ अन्य राज्यों में भी यह नाम व्यक्तिगत या पारिवारिक पहचान के रूप में दिखाई देता है।

    इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि ‘मुल्ला’ केवल किसी एक मुस्लिम समुदाय या एक ही इलाके से जुड़े लोगों का नाम है।

    क्या हर ‘मुल्ला’ धार्मिक विद्वान होता है?

    यह जरूरी नहीं है।

    किसी व्यक्ति के नाम के साथ ‘मुल्ला’ लिखा होना दो अलग परिस्थितियों को दर्शा सकता है। एक स्थिति में यह धार्मिक ज्ञान या भूमिका से जुड़ा सम्मानसूचक संबोधन हो सकता है। दूसरी स्थिति में यह पीढ़ियों से चला आ रहा पारिवारिक उपनाम हो सकता है।

    इसलिए केवल नाम देखकर किसी व्यक्ति की धार्मिक शिक्षा या पेशे के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

    ‘पंडित’ से तुलना क्यों की जाती है?

    भारतीय संदर्भ में कभी-कभी ‘मुल्ला’ की तुलना ‘पंडित’ जैसे शब्दों से की जाती है। दोनों शब्दों का इस्तेमाल कुछ संदर्भों में धार्मिक ज्ञान रखने वाले लोगों के लिए सम्मानसूचक रूप में हुआ है और दोनों ही शब्द कुछ परिवारों के नाम या उपनाम का हिस्सा भी बने हैं।

    लेकिन दोनों की ऐतिहासिक उत्पत्ति और धार्मिक-सामाजिक भूमिका अलग-अलग परंपराओं से जुड़ी हैं। इसलिए यह तुलना केवल समझाने के स्तर पर की जा सकती है, दोनों को पूरी तरह समान मानना सही नहीं होगा।

    नाम में ‘मुल्ला’ लिखने का मतलब क्या समझें?

    सीधी भाषा में कहें तो ‘मुल्ला’ एक ऐसा शब्द है जिसका इस्तेमाल इतिहास में मुस्लिम धार्मिक विद्वानों और धार्मिक शिक्षा से जुड़े लोगों के लिए सम्मानसूचक संबोधन के तौर पर हुआ है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल और अर्थ अलग रहा है।

    वर्तमान समय में यह कुछ लोगों के लिए धार्मिक संबोधन हो सकता है, जबकि कई परिवारों में यह केवल सरनेम या पारिवारिक पहचान के रूप में इस्तेमाल होता है।

    इसलिए किसी के नाम में ‘मुल्ला’ लिखा देखकर उसके धर्म, पेशे या धार्मिक ज्ञान के बारे में कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।

  • सिंधु जल समझौता स्थगित, फिर भी पाकिस्तान की ओर बहता पानी तुरंत क्यों नहीं रोका जा सकता? समझिए पूरी वजह.

    सिंधु जल समझौता स्थगित, फिर भी पाकिस्तान की ओर बहता पानी तुरंत क्यों नहीं रोका जा सकता? समझिए पूरी वजह.

    सिंधु जल समझौता स्थगित, फिर भी पाकिस्तान की ओर बहता पानी तुरंत क्यों नहीं रोका जा सकता? समझिए पूरी वजह.

    भारत ने अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद 1960 के सिंधु जल समझौते को तत्काल प्रभाव से स्थगित यानी abeyance में रखने का फैसला किया था। भारत ने यह कदम तब तक जारी रखने की बात कही है, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को लेकर विश्वसनीय और स्थायी कदम नहीं उठाता।

    लेकिन इसके बाद एक सवाल लगातार उठता रहा है कि अगर समझौता स्थगित हो चुका है, तो भारत पाकिस्तान की ओर बहने वाली पश्चिमी नदियों का पानी पूरी तरह रोक क्यों नहीं देता? इसकी सबसे बड़ी वजह है जल भंडारण और नदी के बहाव को नियंत्रित करने वाला पर्याप्त बुनियादी ढांचा।

    दरअसल, किसी अंतरराष्ट्रीय जल समझौते को स्थगित कर देना और किसी विशाल नदी के पानी को तुरंत रोक देना दो अलग-अलग चीजें हैं।

    पहलगाम हमले के बाद भारत ने क्या फैसला लिया?

    22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी। इसके अगले दिन भारत सरकार ने कई कड़े कदमों के साथ सिंधु जल समझौते को तत्काल प्रभाव से स्थगित करने का निर्णय लिया। सरकार ने कहा था कि यह स्थिति तब तक जारी रहेगी, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के समर्थन से विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय रूप से पीछे नहीं हटता।

    विदेश मंत्रालय ने भी मई 2025 में स्पष्ट किया था कि सिंधु जल समझौता फिलहाल abeyance में है।

    यहां यह समझना जरूरी है कि इसे सीधे तौर पर “भारत ने संधि रद्द कर दी” कहना पूरी तरह सटीक नहीं है। आधिकारिक भाषा में भारत ने समझौते को स्थगित रखा है।

    सिंधु जल समझौते में नदियों का बंटवारा कैसे हुआ था?

    1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मदद से सिंधु जल समझौता हुआ था। इसके तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों को दो हिस्सों में बांटा गया।

    पूर्वी नदियां — रावी, ब्यास और सतलुज

    इन नदियों के पानी के इस्तेमाल का अधिकार मुख्य रूप से भारत को दिया गया। विश्व बैंक के दस्तावेज के अनुसार इन तीन नदियों का औसत वार्षिक प्रवाह लगभग 33 मिलियन एकड़-फीट यानी 33 MAF था।

    पश्चिमी नदियां — सिंधु, झेलम और चिनाब

    इन नदियों के पानी का अधिकांश हिस्सा पाकिस्तान के इस्तेमाल के लिए निर्धारित किया गया। हालांकि, संधि में भारत को भी इन नदियों पर कुछ सीमित अधिकार दिए गए थे।

    भारत को घरेलू उपयोग, सीमित कृषि और पनबिजली उत्पादन के साथ-साथ पश्चिमी नदियों पर निर्धारित सीमा के भीतर पानी स्टोर करने की अनुमति थी। कुल स्टोरेज की सीमा 3.6 MAF रखी गई थी।

    फिर भारत तुरंत पाकिस्तान का पानी क्यों नहीं रोक सकता?

    यही इस पूरे मामले की सबसे अहम बात है।

    नदी का पानी किसी पाइप या नल की तरह नहीं है, जिसे एक आदेश देकर तुरंत बंद किया जा सके। पानी को रोकने के लिए बड़े बांध, जलाशय, बैराज, सुरंगें और दूसरी जल परियोजनाएं चाहिए होती हैं।

    विशेष रूप से सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी नदियों का प्रवाह बहुत बड़ा है। इन नदियों में हिमपिघलन और बारिश के कारण मौसम के अनुसार पानी की मात्रा काफी बदलती रहती है।

    इसलिए यदि भारत को इन नदियों के पानी का बड़ा हिस्सा अपने इस्तेमाल के लिए रोकना या मोड़ना है, तो उसके लिए बड़े पैमाने पर स्टोरेज और डायवर्जन इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना होगा।

    3.6 MAF की सीमा भी क्यों महत्वपूर्ण है?

    1960 की संधि में भारत के लिए पश्चिमी नदियों पर कुल 3.6 MAF स्टोरेज की अनुमति का प्रावधान था।

    इसमें अलग-अलग उद्देश्यों के लिए स्टोरेज शामिल था। उपलब्ध सरकारी दस्तावेज के अनुसार 3.6 MAF में सामान्य स्टोरेज, पनबिजली से संबंधित स्टोरेज और बाढ़ नियंत्रण से जुड़ी क्षमता शामिल थी।

    इसका मतलब यह है कि संधि के दौरान भी भारत को पश्चिमी नदियों पर कुछ मात्रा में पानी नियंत्रित करने की अनुमति थी। लेकिन इस क्षमता का इस्तेमाल करने के लिए भी बड़े स्तर पर परियोजनाओं की जरूरत थी।

    यही कारण है कि समझौते के स्थगित होने के बाद भी पानी को तुरंत रोक देना तकनीकी रूप से संभव नहीं हो जाता।

    बड़े बांध और जलाशय बनाने में क्यों लगता है लंबा समय?

    किसी बड़ी नदी पर जल परियोजना बनाना बेहद जटिल प्रक्रिया है।

    सबसे पहले जमीन और नदी घाटी का सर्वे किया जाता है। इसके बाद परियोजना की तकनीकी और आर्थिक व्यवहार्यता देखी जाती है। फिर विस्तृत परियोजना रिपोर्ट, पर्यावरणीय मंजूरियां, भूमि से जुड़े मामलों और वित्तीय स्वीकृतियों जैसी प्रक्रियाएं होती हैं।

    इसके बाद बांध, सुरंग, पावरहाउस, जलाशय और संबंधित नहरों का निर्माण शुरू होता है।

    इतनी बड़ी परियोजनाओं को पूरा होने में कई साल लग सकते हैं। इसलिए 2025 में लिया गया राजनीतिक और कूटनीतिक फैसला अपने आप में अगले ही दिन बड़े पैमाने पर जल भंडारण क्षमता में नहीं बदल सकता।

    गर्मियों और मानसून में सबसे बड़ी चुनौती

    चिनाब, झेलम और सिंधु जैसी नदियों का पानी सालभर एक जैसा नहीं रहता।

    हिमालयी क्षेत्रों में गर्मियों के दौरान बर्फ पिघलने से नदियों में प्रवाह बढ़ता है। मानसून के दौरान बारिश के कारण इसमें और वृद्धि हो सकती है।

    ऐसे समय में पानी की बड़ी मात्रा को रोकने के लिए विशाल जलाशयों की जरूरत होती है। केवल छोटे बांध या रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाएं इतनी बड़ी मात्रा में पानी को लंबे समय तक जमा करने का विकल्प नहीं बन सकतीं।

    यही वजह है कि संधि स्थगित करना और पानी का भौतिक नियंत्रण हासिल करना दो अलग-अलग चरण हैं।

    क्या भारत अब अपनी जल परियोजनाएं तेजी से आगे बढ़ा सकता है?

    संधि को abeyance में रखने के बाद भारत के सामने पश्चिमी नदियों पर अपने जल संसाधनों के उपयोग को बढ़ाने का अवसर जरूर बढ़ा है। सरकार ने भी लंबे समय से अटकी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने और जल संसाधनों के बेहतर उपयोग पर जोर दिया है।

    जल शक्ति मंत्रालय से जुड़े दस्तावेजों में भी पश्चिमी नदियों से संबंधित परियोजनाओं और जल भंडारण क्षमता बढ़ाने की दिशा में काम का उल्लेख मिलता है।

    हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत रातोंरात पाकिस्तान की ओर जाने वाला पूरा पानी रोक सकता है।

    इसके लिए नई परियोजनाओं का निर्माण, मौजूदा ढांचे का विस्तार और नदी के पानी को स्टोर या डायवर्ट करने की पर्याप्त क्षमता विकसित करना जरूरी होगा।

    आसान भाषा में समझें पूरा मामला

    अगर किसी नदी में हर साल बहुत बड़ी मात्रा में पानी बहता है और उसे रोकने के लिए आपके पास पर्याप्त बड़ा जलाशय नहीं है, तो केवल सरकारी आदेश जारी करके उस पानी को जमा नहीं किया जा सकता।

    सिंधु जल समझौते का स्थगन भारत को जल संसाधनों के इस्तेमाल के मामले में नई नीति और परियोजनाओं की दिशा में आगे बढ़ने का आधार देता है, लेकिन पानी को जमीन पर रोकने के लिए बांध, जलाशय और दूसरी परियोजनाएं बनाना जरूरी है।

    इसीलिए समझौता स्थगित होने के बावजूद पाकिस्तान की ओर पानी का बहाव तुरंत पूरी तरह बंद दिखाई नहीं देता। असली चुनौती अब जल कूटनीति से आगे बढ़कर जल भंडारण और बुनियादी ढांचे की क्षमता तैयार करने की है।

  • किन देशों को बिजली सप्लाई करता है भारत…

    किन देशों को बिजली सप्लाई करता है भारत…

    किन देशों को बिजली सप्लाई करता है भारत…

    भारत अपने पड़ोसी देशों के साथ सिर्फ व्यापार और परिवहन के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि बिजली के मामले में भी सहयोग करता है। सीमा पार ट्रांसमिशन नेटवर्क के जरिए भारत कई देशों को बिजली की आपूर्ति करता है। इनमें नेपाल, बांग्लादेश, भूटान और म्यांमार प्रमुख हैं।

    अब नेपाल एक बार फिर अपनी बिजली की जरूरत पूरी करने के लिए भारत से बड़ी मात्रा में बिजली खरीदने जा रहा है। नेपाल की कई पनबिजली परियोजनाओं को हाल में आई आपदा से नुकसान पहुंचा है। इसके कारण वहां बिजली उत्पादन प्रभावित हुआ है और परियोजनाओं की मरम्मत के दौरान अतिरिक्त बिजली की जरूरत पड़ रही है।

    रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल दिसंबर 2026 से मई 2027 के बीच भारत से जरूरत के अनुसार 1100 मेगावाट तक बिजली आयात करने की योजना बना रहा है।

    भारत नेपाल को क्यों दे रहा है अतिरिक्त बिजली?

    नेपाल की बिजली व्यवस्था में हाइड्रोपावर की बड़ी भूमिका है। देश में बिजली उत्पादन के लिए नदियों और जलविद्युत परियोजनाओं पर काफी निर्भरता है।

    सर्दियों में कई नदियों में पानी का बहाव कम हो जाता है, जिससे हाइड्रोपावर प्लांट का उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा हाल की प्राकृतिक आपदा में कुछ पनबिजली परियोजनाओं को नुकसान पहुंचने से स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो गई है।

    ऐसे समय में भारत से बिजली आयात करके नेपाल अपनी घरेलू जरूरत पूरी करने की कोशिश कर रहा है।

    भारत अभी कितनी बिजली देने की मंजूरी दे चुका है?

    नेपाल की तत्काल जरूरत को देखते हुए भारत ने प्रतिदिन 18 घंटे तक बिजली आपूर्ति की अनुमति दी है। जरूरत के हिसाब से यह सप्लाई करीब 654 मेगावाट से बढ़कर 1100 मेगावाट तक जा सकती है।

    इसका मतलब यह नहीं है कि 1100 मेगावाट बिजली पूरे समय एक समान मात्रा में सप्लाई होगी। वास्तविक आपूर्ति नेपाल की मांग, उपलब्धता और तय व्यवस्था पर निर्भर करेगी।

    भारत नेपाल को किस भाव पर बिजली बेचता है?

    नेपाल को मिलने वाली बिजली की दर ट्रांसमिशन लाइन के वोल्टेज स्तर के अनुसार अलग-अलग रखी गई है।

    132 kV ट्रांसमिशन लाइन: NPR 8.22 प्रति यूनिट

    33 kV ट्रांसमिशन लाइन: NPR 8.91 प्रति यूनिट

    11 kV ट्रांसमिशन लाइन: NPR 9.55 प्रति यूनिट

    यहां NPR का मतलब नेपाली रुपया है।

    यानी जिस ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए बिजली नेपाल तक पहुंचाई जाएगी, उसके हिसाब से दर लागू होगी। दी गई तीन दरों में 132 kV लाइन की कीमत सबसे कम और 11 kV लाइन की कीमत सबसे ज्यादा है।

    क्या बाजार के हिसाब से बिजली की कीमत बदल सकती है?

    हां, बिजली व्यापार में बाजार की स्थिति का भी असर पड़ सकता है। खासकर जब अतिरिक्त बिजली की जरूरत अचानक बढ़ती है या बिजली की मांग में बड़ा बदलाव आता है, तब एक्सचेंज के जरिए खरीदी जाने वाली बिजली की कीमत अलग हो सकती है।

    कुछ परिस्थितियों में भारतीय पावर एक्सचेंज से मिलने वाली बिजली की औसत कीमत करीब NPR 11 प्रति यूनिट तक पहुंचने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है। इसलिए तय ट्रांसमिशन दर और बाजार से खरीदी जाने वाली बिजली की कीमत को एक ही चीज नहीं माना जाना चाहिए।

    भारत किन-किन देशों को बिजली देता है?

    भारत सीमा पार बिजली व्यापार के जरिए अपने कई पड़ोसी देशों के साथ बिजली का आदान-प्रदान करता है।

    इनमें मुख्य रूप से:

    • नेपाल
    • बांग्लादेश
    • भूटान
    • म्यांमार

    शामिल हैं।

    इन देशों के साथ अलग-अलग ट्रांसमिशन लाइनों और बिजली व्यापार व्यवस्थाओं के जरिए बिजली का कारोबार होता है।

    बांग्लादेश को भी भारत देता है बिजली

    भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से सीमा पार बिजली व्यापार चल रहा है। दोनों देशों के बिजली ग्रिड आपस में जुड़े हुए हैं, जिसके जरिए भारत से बांग्लादेश को बिजली पहुंचाई जाती है।

    इसके अलावा भारत के ट्रांसमिशन नेटवर्क की मदद से नेपाल में पैदा होने वाली बिजली को भी क्षेत्रीय बिजली व्यापार के तहत बांग्लादेश तक पहुंचाने की व्यवस्था विकसित की गई है।

    इस तरह भारत का बिजली ग्रिड सिर्फ भारत और उसके किसी एक पड़ोसी देश के बीच व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय ऊर्जा सहयोग में भी भूमिका निभाता है।

    भूटान और म्यांमार के साथ भी बिजली कारोबार

    भारत का भूटान और म्यांमार के साथ भी सीमा पार बिजली व्यापार होता है। दोनों देशों के साथ बिजली ट्रांसमिशन और ग्रिड कनेक्टिविटी की व्यवस्थाएं मौजूद हैं।

    भूटान के मामले में बिजली व्यापार दोनों दिशाओं में हो सकता है। भूटान अपनी हाइड्रोपावर परियोजनाओं से पैदा होने वाली बिजली भारत को देता है, जबकि जरूरत पड़ने पर भारत से बिजली भी खरीद सकता है।

    नेपाल के लिए भारत की बिजली क्यों महत्वपूर्ण है?

    नेपाल के लिए भारत से बिजली खरीदने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि जब घरेलू उत्पादन कम होता है, तब अतिरिक्त बिजली उपलब्ध कराई जा सकती है।

    खासकर सर्दियों में जब नदियों का जलस्तर कम होने से हाइड्रोपावर उत्पादन प्रभावित हो सकता है, तब आयातित बिजली नेपाल की मांग पूरी करने में मदद कर सकती है।

    वहीं, क्षतिग्रस्त पनबिजली परियोजनाओं की मरम्मत के दौरान भारत से मिलने वाली बिजली वहां की बिजली व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव को कम कर सकती है।

    भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है सीमा पार बिजली व्यापार

    भारत के लिए पड़ोसी देशों के साथ बिजली कारोबार क्षेत्रीय ऊर्जा सहयोग का हिस्सा है। इससे अतिरिक्त बिजली के लिए नए बाजार मिलते हैं और पड़ोसी देशों के साथ बिजली ग्रिड की कनेक्टिविटी मजबूत होती है।

    नेपाल के मामले में तस्वीर खास तौर पर दिलचस्प है, क्योंकि दोनों देशों के बीच बिजली का व्यापार सिर्फ एकतरफा नहीं है। परिस्थितियों के अनुसार नेपाल भारत से बिजली खरीदता है और नेपाल की जलविद्युत परियोजनाओं से पैदा होने वाली बिजली का निर्यात भी भारत की दिशा में किया जाता है।

    यानी आने वाले समय में भारत और नेपाल के बीच बिजली व्यापार सिर्फ जरूरत के समय बिजली खरीदने-बेचने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि क्षेत्रीय ऊर्जा नेटवर्क और सीमा पार बिजली बाजार के विस्तार में भी इसकी भूमिका बढ़ सकती है।

  • पाकिस्तान का लंबा: चक्कर छोड़ चीन के होटन एयर रूट की जरूरत क्यों पड़ी, भारत को क्या होगा फायदा?

    पाकिस्तान का लंबा: चक्कर छोड़ चीन के होटन एयर रूट की जरूरत क्यों पड़ी, भारत को क्या होगा फायदा?

    पाकिस्तान का लंबा: चक्कर छोड़ चीन के होटन एयर रूट की जरूरत क्यों पड़ी, भारत को क्या होगा फायदा?

    भारत और पाकिस्तान के बीच हवाई क्षेत्र को लेकर जारी पाबंदियों का असर अब भारतीय एयरलाइंस की अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर भी साफ दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान का एयरस्पेस भारतीय विमानों के लिए बंद होने के कारण यूरोप और उत्तरी अमेरिका जाने वाली कई उड़ानों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ रहा है।

    इसी समस्या का विकल्प तलाशते हुए भारत अब चीन के शिनजियांग क्षेत्र में स्थित होटन के ऊपर से संभावित एयर कॉरिडोर को लेकर बातचीत कर रहा है। नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू ने सितंबर 2026 में बताया कि दोनों देशों के बीच इस रूट को लेकर चर्चा चल रही है और विदेश मंत्रालय इस मामले में चीन के साथ संपर्क में है। अभी इस रूट को लेकर कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ है।

    अगर भविष्य में इस कॉरिडोर को मंजूरी मिलती है, तो कुछ पश्चिमी देशों के लिए जाने वाली भारतीय उड़ानों को मौजूदा लंबे दक्षिणी रास्ते की तुलना में छोटा विकल्प मिल सकता है।

    पाकिस्तान का एयरस्पेस बंद होने से क्या बदला?

    अप्रैल 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ने के बाद पाकिस्तान ने भारतीय पंजीकृत और भारतीय एयरलाइंस द्वारा संचालित विमानों के लिए अपना हवाई क्षेत्र बंद कर दिया था। इस प्रतिबंध को कई बार बढ़ाया गया है और मौजूदा NOTAM के अनुसार यह 24 अक्टूबर 2026 तक लागू है।

    इसके कारण दिल्ली, मुंबई और उत्तर-पश्चिम भारत से यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका जाने वाली उड़ानों को पाकिस्तान के ऊपर से गुजरने के बजाय वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।

    कई उड़ानों को अरब सागर और ओमान की दिशा में लंबा चक्कर लगाना पड़ता है। रूट के आधार पर उड़ान का समय करीब 45 मिनट से लेकर 2 घंटे तक बढ़ सकता है।

    लंबा रास्ता यानी ज्यादा ईंधन और ज्यादा खर्च

    विमान जितनी देर तक हवा में रहेगा, उतना ही ज्यादा ईंधन खर्च होगा। लंबी उड़ान का असर सिर्फ ईंधन पर नहीं पड़ता, बल्कि विमान के इस्तेमाल का समय, चालक दल की ड्यूटी और परिचालन लागत भी बढ़ सकती है।

    लंबे रूट का एक और असर यह है कि एक विमान को अपनी यात्रा पूरी करने में ज्यादा समय लगता है। इससे उसी विमान को अगली उड़ान के लिए उपलब्ध कराने में भी अधिक समय लग सकता है।

    यानी एयरस्पेस बंद होने का असर सिर्फ एक उड़ान के अतिरिक्त किलोमीटर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी एयरलाइन के ऑपरेशन पर पड़ सकता है।

    एयर इंडिया को कितना नुकसान हुआ?

    पाकिस्तानी एयरस्पेस बंद होने का आर्थिक असर एयर इंडिया पर विशेष रूप से पड़ा है, क्योंकि कंपनी दिल्ली और मुंबई से यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका के लिए बड़ी संख्या में लंबी दूरी की उड़ानें संचालित करती है।

    एयर इंडिया के पूर्व सीईओ कैंपबेल विल्सन ने 2025 में अनुमान लगाया था कि पाकिस्तान के एयरस्पेस प्रतिबंध के कारण एयरलाइन को एक साल में करीब 4,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त नुकसान हुआ। यह आंकड़ा उस समय का अनुमान था, इसलिए इसे मौजूदा साल का निश्चित नुकसान नहीं माना जाना चाहिए।

    क्या है चीन के होटन एयर रूट का प्रस्ताव?

    भारत जिस विकल्प पर बातचीत कर रहा है, उसमें दिल्ली और मुंबई जैसी जगहों से पश्चिम की ओर जाने वाली कुछ उड़ानों को उत्तर दिशा में ले जाकर लद्दाख के आसपास से चीन के शिनजियांग क्षेत्र में प्रवेश कराने की संभावना है।

    प्रस्तावित रूट में विमान होटन के आसपास के चीनी हवाई क्षेत्र से गुजरकर किर्गिस्तान और मध्य एशिया की ओर बढ़ सकते हैं। इसके बाद वे यूरोप, ब्रिटेन और उत्तरी अमेरिका जाने वाले मौजूदा अंतरराष्ट्रीय एयर रूट से जुड़ सकते हैं।

    इसका फायदा यह हो सकता है कि कुछ उड़ानों को अरब सागर और ओमान की तरफ लंबा दक्षिणी चक्कर न लगाना पड़े।

    भारत को इससे क्या फायदा हो सकता है?

    अगर चीन इस एयर कॉरिडोर को मंजूरी देता है और सभी तकनीकी व्यवस्थाएं तैयार हो जाती हैं, तो संभावित फायदे कई स्तर पर हो सकते हैं।

    पहला फायदा—समय की बचत। कुछ पश्चिमी गंतव्यों के लिए उड़ान का रास्ता छोटा हो सकता है।

    दूसरा—ईंधन की बचत। कम दूरी का मतलब कुछ मार्गों पर कम ईंधन खपत हो सकती है।

    तीसरा—परिचालन लागत में कमी। कम उड़ान समय से विमान और चालक दल के इस्तेमाल की लागत पर असर पड़ सकता है।

    चौथा—विमान के बेहतर इस्तेमाल की संभावना। अगर लंबी दूरी और उड़ान समय कम होता है, तो एयरलाइन अपने विमान को अधिक कुशलता से शेड्यूल कर सकती है।

    होटन रूट से जॉर्जिया, बाकू, मध्य एशिया और उत्तरी यूरोप जैसे कुछ गंतव्यों के लिए विशेष रूप से समय और लागत में बचत की संभावना बताई गई है।

    लेकिन चीन का रास्ता इतना आसान भी नहीं

    होटन एयर कॉरिडोर को लेकर सबसे बड़ी बात यह है कि यह अभी सिर्फ बातचीत और संभावित विकल्प के स्तर पर है। चीन की अनुमति के बिना भारतीय विमान उसके हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं कर सकते।

    इसके अलावा शिनजियांग का भौगोलिक क्षेत्र भी चुनौतीपूर्ण है। आसपास ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र हैं और आपात स्थिति में विमानों को सुरक्षित रूप से नीचे उतरने के लिए पर्याप्त वैकल्पिक रास्तों तथा हवाई अड्डों की जरूरत होती है।

    इसलिए किसी भी नए कॉरिडोर को शुरू करने से पहले एयर ट्रैफिक मैनेजमेंट, सुरक्षा, आपातकालीन डायवर्जन और चीन के नागरिक एवं अन्य संबंधित हवाई प्राधिकरणों के साथ समन्वय जैसे मुद्दों पर विस्तृत व्यवस्था करनी होगी।

    क्या यह पाकिस्तान वाले रास्ते की पूरी भरपाई कर देगा?

    जरूरी नहीं। होटन कॉरिडोर अगर शुरू भी होता है तो उसका फायदा हर अंतरराष्ट्रीय रूट को समान रूप से नहीं मिलेगा। अलग-अलग गंतव्यों के लिए दूरी, मौसम, हवाई क्षेत्र की अनुमति और उपलब्ध एयर रूट अलग हो सकते हैं।

    फिर भी भारत के लिए यह एक अतिरिक्त विकल्प बन सकता है। अभी पाकिस्तान का एयरस्पेस बंद होने के कारण जिन उड़ानों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ रहा है, उनके लिए कोई छोटा वैकल्पिक कॉरिडोर परिचालन लागत और उड़ान समय को कम करने में मदद कर सकता है।

    फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि भारत और चीन के बीच होटन रूट को लेकर बातचीत जारी है, लेकिन इस रास्ते को खोलने की कोई अंतिम तारीख या समझौता घोषित नहीं हुआ है।

    अगर सहमति बनती है, तो यह भारत की यूरोप और उत्तरी अमेरिका जाने वाली कुछ उड़ानों के लिए पाकिस्तान के एयरस्पेस बंद होने के बीच एक नया विकल्प बन सकता है।